लिकोरिया रोग क्या है ?
महिलाओं की योनि से निकलने वाला स्राव Leucorrhea कहलाता है। यह स्राव ज्यादातर सफेद रंग का होता है इस लिए इसे सफेद पानी, श्वेत प्रदर आदि नामों से जाना जाता है। यह निकलने वाला स्राव कभी कभी दुर्गन्धित भी होता है, और जेली जैसा भी हो सकता है। सफेद रंग का होने के अलावा कई अन्य रंगों को लिए भी हो सकता है। इसे इंग्लिश में लिकोरिया कहा जाता है।
स्वस्थ अवस्था में महिलाओं की योनि को नम बनाए रखने के लिए म्यूकस ग्लैंड से कुछ स्राव निकलता रहता है जब कभी इस स्राव की अधिकता होती है तो इसे Leucorrhoea रोग समझना चाहिए। कभी कभी यह स्राव सफेद, हल्के पीले, काला या लाल भूरे रंग का हो सकता है। यह स्राव पानी जैसा पतला या जैली जैसा भी हो सकता है। शुरू में यह कम होता है परंतु इलाज न करने पर यह बढ़ भी जाता है। हमारे देश में लगभग 90% महिलाएं इसकी शिकार हैं। यह रोग नहीं होता परंतु दूसरे रोगों का कारण बन सकता है।
लिकोरिया होने के कारण :
1. महिलाओं के यूटरस में सूजन या इन्फेक्शन होने पर।
2. बच्चेदानी का अपने स्थान से हट जाना या खिसक जाना।
3. बार बार गर्भपात का होना।
4. सेक्सुअल एक्साइटमेंट के कारण।
5. लंबी बीमारी और शारीरिक क्षीणता।
6. दूषित जल और दूषित भोजन करने से।
7. अधिक परिश्रम करने से।
8. अधिक सेक्स करने से।
9. आर्टिफिशियल सेक्सुअल इक्विपमेंट के प्रयोग करने से।
10. सेक्स के दौरान योनि में चोट लगने से।
11. कम उम्र में शादी हो जाने पर ।
रोग की तीव्रता कब होती है।
1. मासिक धर्म से पहले या इसके बाद
2.योवनावस्था के समय
3. सेक्स की उत्तेजना में ।
4. अधिक परिश्रम करने के दौरान।
5. बादी चीजों का अधिक प्रयोग करने से।
6. ज्यादा गर्म वस्तुओं का सेवन करने से।
7. उल्टी सीधी हाई पोटेंसी दवाइयां लेने से।
8. एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग से।
9. सेक्स के करने के बाद।
10. किसी भी दर्द निवारक दवाओं के प्रयोग से।
रोग किस उम्र में हो जाता है ?
इस रोग का उम्र या समय निर्धारण करना कठिन है परंतु यह बचपन से लेकर 60 साल की उम्र वाली महिलाओं को भी होते देखा गया है।
रोग के लक्षण :
1. योनि से सफेद पानी का रिसाव होना।
2. स्राव कई रंगों में हो सकता है जैसे काला, बदबूदार, चिपचिपा, हल्का पीला, लाल या भूरे रंग का हो सकता है।
3. योनि में खुजली और जलन का होना ।
4. कमर का दर्द बढ़ जाना ।
5. कमजोरी महसूस होना ।
6. आंखों के आगे अंधेरा आना।
7. आंखों के चारों ओर काले घेरों का होना।
8. चिड़चिड़ापन, भूख का न लगना ।
9. हाथ पैरों में दर्द का होना।
10.उठने बैठने पर दर्द का होना आदि लक्षणों में लिकोरिया का हो जाना सुनिश्चित होता है।
लिकोरिया की होम्योपैथिक चिकित्सा :
होम्योपैथिक में रोग के लक्षणों के अनुसार उसका इलाज किया जाता है, किसी भी बीमारी के 10 लक्षणों के आधार पर दवाओं का चुनाव किया जाता है। इस प्रकार होम्योपैथिक दवाओं से इलाज करना सर्वथा सफल होता है।
इस तरह के इलाज में रोगी के रोग लक्षणों, रोगी का स्वभाव रोगी का रंग तथा रोगी के मन की बातें आदि परखकर इलाज करना उचित होता है अन्यथा रोग का उपचार सफल नहीं हो सकता।
एक योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक ऊपर दी गई जानकारी से इलाज करने में प्रवीणता हासिल करते हैं।
लिकोरिया की होम्योपैथिक दवाइयों का चयन उसके लक्षणों के अनुसार कर सकते हैं, बिना किसी Sideeffect के द्वारा।
Pulsatilla 30/ 200 :
इस दवा का प्रयोग हमेशा गोरी महिलाओं के रोगों के इलाज में किया जाता है अतः बिना किसी हिचक के पहले लो पोटेंसी में दवाओं का चयन करें तो आशातीत लाभ मिलते हैं, कुछ दिनों के बाद हाई पोटेंसी की दवाइयां देना उचित होता है तब जब रोगी पूर्ण आराम नहीं मिले तो।
Sepia 30/200 :
वे महिलाएं जिनका रंग काला तथा सांवला है इस दवा के प्रयोग से लाभ मिल जाता है चाहे वह कोई भी रोग क्यों न हों इस दवा को ऑल्टरनेटिव दवा के तौर पर दे सकते हैं।
उपरयुक्तत दवाओं के आलावा रोग के सभी लक्षणों को ध्यान में रखकर लिकोरिया का इलाज कर सकते हैं। अन्य होम्योपैथिक दवाओं जैसे Crijotam, Graphites, Borax, Coculas Indica, Alumina, आदि का चयन रोग के लक्षणों के अनुसार करना चाहिए।
इस प्रकार से हमने जाना लिकोरिया रोग क्या है, रोग होने के कारण,रोग की तीव्रता कब होती है, रोगी की उम्र, लक्षण एवं होम्योपैथिक दवाइयां आदि।
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